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क्या अद्भुत खोज है! वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि चींटियाँ सर्दियों के लिए आवश्यक अनाज और बीज इकट्ठा करने के बाद उन बीजों को अपने घोंसलों में जमा करने से पहले आधा कर देती हैं क्योंकि आधा तोड़ने से वे बारिश और सबसे सही अंकुरण स्थितियों के बावजूद अंकुरित नहीं हो पाते हैं। लेकिन वैज्ञानिक तब दंग रह गए जब उन्होंने पाया कि चींटियों के घोंसलों में रखे धनिया के बीज 2 टुकड़ों की बजाय 4 टुकड़ों में टूट गए थे! प्रयोगशाला अनुसंधान के बाद, वैज्ञानिकों ने पाया कि धनिया का बीज दो भागों में विभाजित होने के बाद भी अंकुरित हो जाता है, लेकिन चार भागों में विभाजित होने के बाद यह अंकुरित नहीं होगा! तो ये छोटे छोटे जीव यह सब कैसे जानते हैं? मनुष्य बहुत कम जानता है, दूसरे जीवों से सीखने के लिए बहुत कुछ है!
बास का होटल , एक बार तो पढ़ो
जहां लोग मुफ्त में सलाह भी देना मुनासिफ नही समझते वहां राजस्थान के नागौर जिला मुख्यालय से 5 किलोमीटर दूर खरनाल रोड पर एक ऐसी गौशाला संचालित है जहां आपको चाय एवं छाछ निःशुल्क पिलाई जाती है
वैसे तो गांव में दादी परदादी से लेकर आज तक किसान परिवार निःशुल्क छाछ पड़ोसी और जरूरतमंदों तो देते आये है लेकिन किसी गौशाला का मैं ये पहला प्रयास देख रहा हूँ पहली बार शहर गया तो मालूम चला कि छाछ भी पैसो से मिलती है
आप मानो या ना मानो राजस्थान के लोगो का दिल दरिया है
इस पहल की सब जगह सराहना हो रही है और ये विगत कई वर्षों से जारी है आपको पसन्द आये तो आवश्य शेयर करना जिससे दूसरी जगह की गौशाला जरूरतमंद लोगों के लिए ऐसी सुविधा मुहैया करवाने की पहल कर सके
#bosh
🙏🙏जय सियाराम जी🙏🙏
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प्रमुदित तीरथराज निवासी।
बैखानस बटु गृही उदासी॥
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कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा।
भरत सनेहु सीलु सुचि साँचा॥
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भावार्थ:-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि तीर्थराज प्रयाग में रहने वाले वनप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और उदासीन (संन्यासी) सब बहुत ही आनंदित हैं और दस-पाँच मिलकर आपस में कहते हैं कि भरतजी का प्रेम और शील पवित्र और सच्चा है।
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सुनत राम गुन ग्राम सुहाए।
भरद्वाज मुनिबर पहिं आए॥
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दंड प्रनामु करत मुनि देखे।मूरतिमंत भाग्य निज लेखे॥
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भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी के सुंदर गुण समूहों को सुनते हुए वे मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजी के पास आए। मुनि ने भरतजी को दण्डवत प्रणाम करते देखा और उन्हें अपना मूर्तिमान सौभाग्य समझा।
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वंदउ राम लखन वैदेही।
जे तुलसी के परम् सनेही॥
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अनुज जानकी सहित निरंतर ।
बसउ राम नृप मम उर अंतर॥
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🙏🙏जय सियाराम जी🙏🙏