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राम मंदिर के लिए 3.50 लाख लोगों ने दिया बलिदान।
अयोध्या में राम मंदिर के लिए सन 1033 से लेकर 1990 में प्रधानमंत्री वी पी सिंह के कार्यकाल तक 78 धर्मयुद्ध हुए जिसमें 3.50 लाख हिन्दू बलिदान हुए।
औरंगजेब के शासनकाल में इस मंदिर पर सर्वाधिक 30 हमले हुए, जबकि अकबर के समय 20 हमले हुए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को दिए गए इस कॉफ़ी टेबल बुक में मिलेगी आपको रामजन्मभूमि आंदोलन से जुड़ी हर जानकारी।
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तारीख 2 नवंबर, वर्ष 1990..
एक सूबे के मुख्यमंत्री आपे से बाहर हो चुके हैं..
तभी अयोध्या के हनुमान गढ़ी चौराहे पर पहली गोली चलती है...
...थोड़ी ही देर में सुबह के साढ़े दस बजने वाले हैं, कुछ ही क्षणों में टिक-टिक करती घड़ी की सुइयां समय के उस मोड़ पर पहुंचने वाली हैं जब सुरक्षाबलों के सिर पर खून सवार होनेवाला है। कारण, सूबे के मुख्यमंत्री आपे से बाहर हैं।
तभी अयोध्या के हनुमान गढ़ी चौराहे पर पहली गोली चलती है और फिर सुरक्षाबल दिगंबर अखाड़े की ओर बढ़ते हैं।
अखाड़े के पास ही एक घर में कोलकाता के कोठारी बंधु थे - शरद कोठारी और रामकुमार कोठारी।
दोनों भाईयों को खींचकर बाहर निकाला जाता है और गोलियां मारकर उनकी हत्या कर दी जाती है। ये वही कोठारी बंधु थे जिन्होंने तीन दिन पहले 30 अक्टूबर को 12 बजे के आसपास बाबरी ढांचे के गुंबद पर भगवा झंडा लहराया था। उस दिन दो घंटे बाद दोबारा कारसेवकों की भीड़ ने ढांचे पर धावा बोला था और सुरक्षा बलों ने जो 20 राउंड गोलियां चलाई थीं उसमें 11 कारसेवकों की जान चली गई थी।
वापस आते हैं उस स्थान पर जहां कोठारी बंधुओं का शव पड़े हैं, जिस तरह उन्हें मारा गया लोग स्तब्ध हैं। सड़क की दूसरी ओर जोधपुर के सीताराम माली के मुंह से सटाकर बंदूक का घोड़ा दबा दिया जाता है। उसकी गलती इतनी थी कि वह आंसू गैस का गोला उठाकर नाली में डाल रहा था।
विचलित करने वाली स्थिति में फैजाबाद के राम अचल गुप्ता की रामधुन थी कि रुक ही नहीं रही थी। उन्हें पीछे से गोली मारी जाती है और स्वर थम जाता है।
कोठारी बंधुओं की हत्या से शुरू हुआ रक्तपात अब अपने चरम पर है। मंदिरों, अखाड़ों में घुस-घुसकर अंधाधुंध गोलियां चलाई जा रही हैं। रामानंदी दिगंबर अखाड़े में घुसकर साधुओं पर कई राउंड गोलियां चलाई जाती हैं। कौन गोली किसे और कहां लगी, कौन घायल हुआ और कौन मर गया, किसे चिंता !जिस तरह लोगों को गोलियां मारी जा रही हैं, उससे सुरक्षा बलों के भी कई लोगों की आंखों में आंसू निकल रहे हैं।
हनुमान गढ़ी से दिगंबर अखाड़ा जाने वाली गली में एक युवक को गोली लगती है और वह वहीं गिर पड़ता है। आसपास बिखरे अपने ही खून से सड़क पर लिखता है - सीताराम। सुरक्षबलों में से किसी ने उनकी खोपड़ी में गोली मारी थी। खून को स्याही बनाने वाले हाथ वहीं निस्तेज पड़ जाते हैं। आसपास की गलियों में साधु-संत और देशभर से आए कारसेवक जहां-तहां बैठकर रामधुन गा रहे हैं। रह-रहकर बरसती गोलियां, दम तोड़ते लोग और इन सबके बीच रामधुन की अटकती-उखड़ती तान।
घड़ी की सुइयां अब 10:45 बजा रही थीं। तुलसी चौराहे पर कत्लेआम के बाद अब बारी थी कोतवाली
के सामने बैठे लोगों की। यहां लोग एक घंटे से भी अधिक समय से बैठे रामधुन गा रहे थे। अर्थात् हनुमान गढ़ी चौराहे पर पहली गोली चलने के भी पहले से। इस टोली का नेतृत्व खजुराहो की सांसद
उमा भारती और अमदाबाद के सांसद हरेंद्र पाठक कर रहे थे। दोनों गिरफ्तार किए जाते हैं और फिर
वहां भी गोलियां चलाई जाती हैं। इसी में कोतवाली के सामने के मंदिर के पुजारी की मृत्यु हो गई।
लगातार आंसू गैस के गोले भी दागे जा रहे थे। राम बाग भवन के ऊपरी तल से एक साधु आंसू गैस
से परेशान लोगों के लिए बाल्टी में भर-भरकर पानी फेंक रहा था। बंदूक उसकी ओर तनती है। गोली चलती है और वह कटे पेड़ की तरह नीचे गिर पड़ता है।
देर शाम तक तक अयोध्या में मरघटी सन्नाटा था। मंदिरों के पट बंद। शाम होते आसपास के वातावरण को भक्तिमय बनाने वाले घंटे-घड़ियाल स्तब्ध! जिस नगरी में घर-घर रामलला विराजते हों और उन्हें हर शाम खाना परोसा जाता हो, वहां शाम का भोग कहीं नहीं लगा। लोगों को हताशा और क्रोध के मिलेजुले
भाव ने घेर रखा था। देर रात कोई डेढ़ हजार लोगों ने कमिश्नर मधुकर गुप्ता की कोठी को घेर लिया।
लोग उनके घर में घुस गए। सब एक ही बात पूछ रहे थे, कारसेवकों पर गोलियां क्यों चलाई?
अयोध्या को उस रात नींद नहीं आई। रामधुन में मग्न रहने वाली नगरी के मन-मस्तिष्क को पूरी रात
गोलियों की तड़-तड़ और चीख-पुकार ने उलझाए रखा था। रात के अंधेरे में जो झंडा आम लोगों ने
उठाया था, 3 नवंबर को भोर की किरणों के साथ उसे अफसरों की पत्नियों ने थामा। कमिश्नर पर प्रश्नों की बौछार वहीं से शुरू हुई, जहां बीती रात आम लोगों ने छोड़ा था। अफसरों की पत्नियों ने पूछा-‘ निहत्थे कारसेवकों पर गोलियां क्यों चलाईं? आप मुख्यमंत्री के अलोकतांत्रिक आदेशों को क्यों मान रहे हैं?