सुनहि विमुक्त बिरत अरु विबई।
लहहि भगति गति संपत्ति नई।।
रामचरितमानस
#sabkeram
#सबके_राम_सबमें_राम
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सुनहि विमुक्त बिरत अरु विबई।
लहहि भगति गति संपत्ति नई।।
रामचरितमानस
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तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आरती॥
रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई॥
रामचरितमानस
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एक उपाय से जातिभेद उठ सकता है। वह उपाय है - भक्ति।
भक्तों के जाति नहीं है। भक्ति होने से देह, मन, आत्मा सब शुद्ध हो जाते है। भक्ति न रहने पर ब्राह्मण, ब्राह्मण नहीं है। भक्ति रहने पर चाण्डाल, चाण्डाल नहीं है।
- रामकृष्ण परमहंस
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