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सीएम मान ब्रह्मज्ञानी श्री ब्रह्मानंद जी भूरी वाले की पुण्यतिथि के अवसर पर ब्रह्मरूप धाम पोजेवाल में शामिल हुए
ब्रह्मज्ञानी जी को याद करते हुए श्रद्धा के पुष्प अर्पित करते हुए

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सीएम मान ब्रह्मज्ञानी श्री ब्रह्मानंद जी भूरी वाले की पुण्यतिथि के अवसर पर ब्रह्मरूप धाम पोजेवाल में शामिल हुए
ब्रह्मज्ञानी जी को याद करते हुए श्रद्धा के पुष्प अर्पित करते हुए

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इस बार सांगरी बहुत कम आई है मौसम में बदलाव के कारण डिडू बण गये सब।फिर भी भाव कम है मेरे गाँव मे साढे सात सौ मे बिक रही है

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मासूम बच्चों को ज़िंदगी जीना सिखाने की बजाय मौत के फ़ायदों के लिए तैयार करने वाला ये मदरसा भारत बांग्लादेश सीमा पर है सब बच्चे स्कूली पढ़ाई छोड़ कर मदरसे में हैं इनको 12-14 वर्ष की आयु में भी उर्दू-अरबी के सामान्य शब्दों की जानकारी तो नहीं दी गई है परंतु मौत के बाद के सफ़र की पढ़ाई कराई जा रही है।

बच्चों के विकास के लिए ये ख़तरनाक है,बच्चों को स्कूल में होना चाहिए।

(वीडियो जन जागरण के उद्देश्य से पोस्ट किया गया है)

आपको लगता होगा इन मदरसो पढाई होती है।

हिन्दुओ सोते रहो सरकार के भरोसे
दिल्ली सरकार ने न जाने कितने हजार मदरसे खुलवा रखे हैं, कोई नही जानता

अगर केंद्र सरकार कोई सर्वे भी कराए तब भी सैकड़ो मदरसे छिपे रह जाएंगे, जो सरकारी रूपए से चलते हैं, लेकिन मान्य नही हैं।

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नि (निषाद)- यह स्वर अपनी तीव्रतासे सभी स्वरोंको दबा देता है, अतः निषाद कहा गया है। इसका स्वभाव ठंडा-शुष्क, रंग काला और स्थान नासिका है। इसकी प्रकृति जोशीली और आह्लादकारी है। इसके देवता सूर्य हैं। यह वातज रोगोंका शमन करता है।
उदाहरण-हाथीका स्वर।

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🙏🙏जय सियाराम जी🙏🙏
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रामसखाँ तेहि समय देखावा।
सैल सिरोमनि सहज सुहावा॥
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जासु समीप सरित पय तीरा।
सीय समेत बसहिं दोउ बीरा॥
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भावार्थ:-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि रामसखा निषादराज ने उसी समय स्वाभाविक ही सुहावना पर्वतशिरोमणि कामदगिरि दिखलाया, जिसके निकट ही पयस्विनी नदी के तट पर सीताजी समेत दोनों भाई निवास करते हैं।
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देखि करहिं सब दंड प्रनामा।
कहि जय जानकि जीवन रामा॥
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प्रेम मगन अस राज समाजू।
जनु फिरि अवध चले रघुराजू॥
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भावार्थ:-सब लोग उस पर्वत को देखकर 'जानकी जीवन श्री रामचंद्रजी की जय हो।' ऐसा कहकर दण्डवत प्रणाम करते हैं। राजसमाज प्रेम में ऐसा मग्न है मानो श्री रघुनाथजी अयोध्या को लौट चले हों।
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भरत प्रेमु तेहि समय जस
तस कहि सकइ न सेषु।
कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु
अह मम मलिन जनेषु॥
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भावार्थ:-भरतजी का उस समय जैसा प्रेम था, वैसा शेषजी भी नहीं कह सकते। कवि के लिए तो वह वैसा ही अगम है, जैसा अहंता और ममता से मलिन मनुष्यों के लिए ब्रह्मानंद है।
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वंदउ राम लखन वैदेही।
जे तुलसी के परम सनेही॥
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अनुज जानकी सहित निरंतर।
बसउ राम नृप मम उर अंतर॥
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🙏🙏जय सियाराम जी🙏🙏

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