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पंडितगण भारत की जिस वर्ण व्यवस्था का लगभग 1000 वर्षों से किताबों या शास्त्रों में वर्णन करते आ रहे हैं,
तो इस 1000 वर्ष पहले लिखी गयी " वेद' नामक पुस्तक का किसी तो विद्यालय मै अध्यन/ अध्यापन हुवा होगा?
तो जिस विद्यालय/ गुरुकुल मै वेद पढ़ाये जाते थे,उस विद्यालय का आज तक कोई पुरातात्विक प्रमाण क्यू नही मिला है ?
क्यूकि बौद्धों के जितने भी विश्वविद्यालय होकर गए है, सबके पुरातात्विक प्रमाण मिले है|
हैं न मजे की बात बिना प्रमाणों के धूर्तो ने वैदिक व्यवस्था को 1000 वर्ष मै स्थापित कर दिया है|
नमो बुद्धाय
हमारा राजपूत समाज तीन भागो में बटा हुआ है
और यही कारण हैं हम पीछे हैं-
1. अमीर राजपूत- जिसको राजपूत एकता से कोई मतलब नहीं क्यों कि उसके पास सब कुछ है, उनके लिए ये बात फालतू है इनका खून ठंडा हो गया , जब तक उन पर मुसीबत नहीं आएगी और दुनिया राजपूत नाम सुनकर जूते नहीं मारेगी तब तक उनको एकता का मतलब समझ नहीं आएगा !
2. मध्यम राजपूत- जो पूरी कोशिश कर रहे हैं राजपूत एकता के लिए , राजपूताना जोश इनके खून में इनमें उबाल रहा है और ये एकता चाहते है, जब जब भी जरुरत होती है तो यही आगे आते हैं और जितना इनसे बन पडता है जरुर करते हैं !
3. गरीब राजपूत(अ)- जिनमे राजपूत एकता कि भावना और राजपूती जोश कूट कूट कर भरा है पर ये मजबूर हैं अपनी गरीबी कि वजह से कि काम करके अपने परिवार को पालें।
गरीब राजपूत(ब)-कुछ गरीब राजपूत वो भी हैं जिन्होने शराब, शबाब, जुए और आपसी दुश्मनी में अपना सबकुछ लुटा दिया। !!!!!!
🚩 हम सब को पता है की राजपूतो में गरीबी केवल राजपूत एकता न होने और एक दूसरे का साथ न देने कि वजह से है। राजपूतों टांग खिचाई वाली आदत छोड़ो
वर्ना
हमें पछताना पड़ेगा
"टांग तो एक दिन भगवान ही खीच लेंगे जिओ तो ऐसे कि हमारा सिर ऊपर रहे" !!!!