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नभ चन्द्र सुरात्रि सुशोभत हैं अरु दिवस सुशोभित दिनकर हैं।
श्रीराम सुशोभैं आठहुं जम जब से बसिगै उर के घर हैं।।
शुक पिक कोकिल तरुवर बैठे मधुमास सुवाच उचारत हैं।
कोशल में बारह मास बसे खग नैनहिं राम निहारत हैं।।
भादों मेघन भरि वारि झरै जल पाइ सलिल उछरै बिखरै।
सरयू नद तीनहुं मौसम में हरि पद परसै उमगै विहरै।।
भादों आश्विन धरि खेतन में सरसों फागुन पियराइ रही।
श्रीराम चरन रज पाइ धरनि जो बोवैं बेगि फुलाइ रही।।
सरयू तट रेणु में धेनु खड़े वैदेही के हाथन ग्रास चरैं।
गोधन वत्सल संग डोलि रहे गोरस सलिला जलवास भरैं।।
सब प्रेम तजे सब नेह तजे जगबन्धन मोह विमोह भये।
सियराम के नाम सो नेह लगी सुध-बुध सब कोशल ओर गये।।
श्री राम लगनि लगि लाज तजी घर बार तजे संसार तजे।
प्रभु चरनन पावन आस जगी मम उर निसिवासर राम भजे ।।
श्री हरि ॐ