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Santa and Mrs. Claus hay bales!!

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Shoe shop manager let a dog inside his store
This is the scene a woman walked into in the shoe shop at Recife. A little disturbed, the woman asked if it wasn’t ugly for the establishment that a stray dog slept inside
The manager responded politely :
“Ma’am , it would be ugly to leave the dog outside, for him to get wet and cold, it’s going to stay here until it stops raining”. ♥️❤️ Respect ✊
Credit: respective owner 💐

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This is absolutely incredible! Ice on the surface of a pond! The photographer calls it "The Eye of the Forest.”

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Don't know why this hasn't received more publicity, but this fifty-foot sculpture was unveiled recently in South Dakota.
It's called 'Dignity' and was done by artist Dale Lamphere to honor the women of the Sioux Nation.

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गीता की सुंदरता यह है कि जिस स्तर पर आप हैं उसी स्तर पर भगवान समाधान देते हैं। यह तभी समझ में आता है जब अर्जुन के प्रश्न को ठीक से समझा जाय।
जैसे निष्काम कर्म योग कोई एक अवस्था नही है। कई अवस्थाओं से चलती एक प्रक्रिया है।
प्रथम अवस्था भौतिक है ! यदि आप यह कहते हैं कि मैं ही कर्ता हूँ।
तो ईश्वर कहते हैं कि ठीक है, तब सभी कर्मों और उसके परिणाम को स्वीकार करो। यह भी एक साधना है।
दूसरी अवस्था धार्मिक है।
मैं कर्ता तो हूँ, लेकिन नियंता कोई और है।
इस पर ईश्वर कहते हैं कि तो ठीक है, तुम सभी परिणामों में समत्व भाव रखो।
सुखे दुखे समे कृत्वा।
तीसरी अवस्था आध्यात्मिक है। मैं कर्ता ही नहीं हूँ।
ईश्वर कहते हैं कि फिर तुम मुझमें ही समर्पित हो जाओ।
मामेकं शरणम वज्र।।

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गीता कि सुंदरता यह है। कि जिस स्तर पर आप हैं। उसी स्तर पर भगवान समाधान देते है। यह तभी समझ में आता है। जब अर्जुन के प्रश्न ठीक से समझा जाय।
जैसे निष्काम कर्म योग कोई एक अवस्था नही है। कई अवस्थाओं से चलती एक प्रक्रिया है।
प्रथम अवस्था भौतिक है ! यदि आप यह कहते हैं। कि मैं ही कर्ता हूँ।
तो ईश्वर कहते हैं। ठीक है, तब सभी कर्मो और उसके परिणाम को स्वीकार करो। यह भी एक साधना है।
दूसरी अवस्था धार्मिक है।
मैं कर्ता तो हूँ, लेकिन नियंता कोई और है।
इस पर ईश्वर कहते हैं। तो ठीक है। तुम सभी परिणामों में समत्व भाव रखो।
सूखे दुखे समे कृत्वा।
तीसरी अवस्था आध्यात्मिक है। मैं कर्ता ही नहीं हूँ।
ईश्वर कहते है। फिर तुम मुझमें ही समर्पित हो जाओ।
मामेकं शरणम वज्र।।

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कलकत्ता अंग्रेजों की राजधानी थी। बंगाल ईसाई मिशनरियों का गढ़ था। वह धर्मपरिवर्तन के लिये गरीबी, चमत्कार का सहारा ले रहे थे।
लेकिन उसी समय बंगाल में एक महान भक्त रामकृष्णजी परमहंस का प्रादुर्भाव हुआ था। मिशनरी उन्हें बाधक समझने लगी। उन्हें अपमानित करने की योजना बनी।
परमहंस जी प्रातः गंगा स्नान करने जाते थे। जनसमुदाय उनका दर्शन करता था। आज प्रातः जब परमहंस जी गंगासागर स्नान हेतु आये तो पादरियों के एक समूह ने उन्हें रोक लिया।
उन्होंने परमहंस जी से कहा कि हम लोग आपकी धार्मिक शक्ति देखना चाहते हैं।
उनमें से एक पादरी परमहंस जी से कहा... मैं गंगा को पैदल ही पार कर जाऊँगा। यह मेरे यशु का प्रभाव है। क्या आप पार कर सकते हैं ?
परमहंस जी ने उस पादरी से पूछा... तुमने यह चमत्कार सीखने में कितने वर्ष लगाये ?
पादरी बोला 17 वर्ष लगे हैं।
माँ काली के परमभक्त परमहंस जी ने अपनी पोटली से 50 पैसे निकाले और पादरी को दिया।
बोले तुमने ईश्वर के नाम पर जीवन के 17 वर्ष व्यर्थ कर दिये। तुम्हें पता भी है धर्म क्या है ?
वह नाव है, मछुआरे को 50 पैसे देकर गंगा पार कर जाओ। भगवती वंदना करते हुये परमहंस जी आगे बढ़ गये।
ओशो यह प्रसंग अपने प्रवचन में बोलते हुये कहते थे... जो धर्म को जानते ही नहीं वह रोग, गरीबी, चमत्कार के नाम पर धर्म परिवर्तन करा रहें हैं। यह धर्म परिवर्तन नहीं है।
यह उन गरीब लोगों को धर्महीन करना है जिनके पूर्वजों ने धर्म अन्वेषण में युगों तक साधना की है।।

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कलकत्ता अंग्रेजों की राजधानी थी। बंगाल ईसाई मिशनरियों का गढ़ था। वह धर्मपरिवर्तन के लिये गरीबी, चमत्कार का सहारा ले रहे थे।
लेकिन उसी समय बंगाल में एक महान भक्त रामकृष्णजी परमहंस का प्रादुर्भाव हुआ था। मिशनरी उन्हें बाधक समझने लगी। एक योजना के तहत उन्हें अपमानित करने कि योजना बनी।
परमहंस जी प्रातः गंगा स्नान जाते थे। जनसमुदाय उनका दर्शन करता था। आज प्रातः जब परमहंस जी गंगासागर स्नान हेतु आये तो पादरियों का एक समूह उन्हें रोक लिया।
उन्होंने परमहंस जी से कहा हम लोग आपकी धार्मिक शक्ति को देखना चाहते हैं। उनमें से एक पादरी परमहंस जी से कहा।
मैं गंगा को पैदल ही पार कर जाऊँगा। यह मेरे यशु का प्रभाव है। क्या आप पार कर सकते हैं ?
परमहंस जी ने उस पादरी से पूछा तुमने यह चमत्कार सीखने में कितने वर्ष लगाये ?
पादरी बोला 17 वर्ष लगे हैं।
माँ काली के परमभक्त परमहंस जी ने अपनी पोटली से 50 पैसे निकाले और पादरी को दिया।
बोले तुमने ईश्वर के नाम पर जीवन के 17 वर्ष व्यर्थ कर दिया। तुम्हें पता भी है धर्म क्या है ! वह नाव है, मछुआरे को 50 पैसे देकर गंगा पार कर जाओ। भगवती वंदना करते हुये परमहंस जी आगे बढ़ गये।
ओशो यह प्रसंग अपने प्रवचन में बोलते हुये कहते हैं। जो धर्म को जानते ही नही। वह रोग, गरीबी, चमत्कार के नाम धर्म परिवर्तन करा रहें है। यह धर्म परिवर्तन नहीं है।
यह उन गरीब लोगों को धर्महीन करना है। जिनके पूर्वजों ने धर्म अन्वेषण में युगों तक साधना किया है।।

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