Discover postsExplore captivating content and diverse perspectives on our Discover page. Uncover fresh ideas and engage in meaningful conversations
जाड़े की धूप, टमाटर का सूप ।
मूंगफली के दाने, छुट्टी के बहाने ||
तबीयत नरम, पकौड़े गरम ।
ठंडी हवा, मुँह से धुँआ ||
फटे हुए गाल, सर्दी से बेहाल |
तन पर पड़े, ऊनी कपड़े ||
दुबले भी लगते, मोटे तगड़े।
किटकिटाते दांत, ठिठुरते ये हाथ ||
जलता अलाव, हाथों का सिकाव।
गुदगुदा बिछौना, रजाई में सोना ||
सुबह का होना, सपनो में खोना ।
स्वागत है सर्दियों का आना ||
बाजरा की रोटी , चने का साग
अब तो सिर्फ यादें ही रह गयी है , हमारे 90s के समय मे गाँवो में इसी प्रकार की किचन होती थी और इसी प्रकार का खाना होता था । इन दिनों में तो आलू भी मीठे हो जाते थे इसलिए घर के लोग चने के साग को काटकर सूखा लेते थे फिर गर्मियों के दिनों में इसका उपयोग किया जाता था । उस समय हर एक सब्जी हर एक सीजन में नही मिलती थी । सीजन के हिसाब से ही सब्जी मिलती थी । गांव के लोग सब्जी बाजार से खरीदते ही नही थे सब खेतों में उगाया जाता था ।
यादें बचपन की