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भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के जीवन पर बनी फिल्म सैम बाहादुर ने सिनेमाघरों में 20 दिन कम्प्लीट किया हैं। मेघना गुलजार के निर्देशन में बनी यह एक अच्छी फिल्म हैं, हालांकि पब्लिक के तरफ से फिल्म को ज्यादा अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला हैं। फिल्म में विक्की कौशल ने सैम मानेकशॉ का किरदार निभाया हैं। विक्की ने फिल्म में अच्छा काम किया हैं। लेकिन फिल्म का कलेक्शन ज्यादा अच्छा नहीं रहा। हालांकि फिल्म हिट हो चुकी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 55 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने अबतक वर्ल्डवाइड 109.1 करोड़ की कमाई करी हैं, जिसमें से 81.20 करोड़ घरेलू बॉक्स ऑफिस से कमाया हैं। फिल्म के 20वें दिन की कलेक्शन की बात करें तो 20वें दिन इस फिल्म ने 1.50 करोड़ की कमाई करी हैं।
लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। उनकी माँ का नाम भागीरथीबाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। माता भागीरथीबाई एक सुसंस्कृत, बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ स्वभाव की थी तब उनकी माँ की मृत्यु हो गयी। क्योंकि घर में मनु की देखभाल के लिये कोई नहीं था इसलिए पिता मनु को अपने साथ पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में ले जाने लगे। जहाँ चंचल और सुन्दर मनु को सब लोग उसे प्यार से "छबीली" कहकर बुलाने लगे। मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्र की शिक्षा भी ली। सन् 1842 में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। सितंबर 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। परन्तु चार महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी। सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।
ब्रितानी राज ने अपनी राज्य हड़प नीति के तहत बालक दामोदर राव के ख़िलाफ़ अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया। हालांकि मुक़दमे में बहुत बहस हुई, परन्तु इसे ख़ारिज कर दिया गया। ब्रितानी अधिकारियों ने राज्य का ख़ज़ाना ज़ब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज़ को रानी के सालाना ख़र्च में से काटने का फ़रमान जारी कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप रानी को झाँसी का क़िला छोड़कर झाँसी के रानीमहल में जाना पड़ा। पर रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होनें हर हाल में झाँसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय किया