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*झूठी खबर छापता है दैनिक भास्कर*
आज के दैनिक भास्कर में एक लेख है कि सीता जी के स्वयंवर में रावण नहीं आया था और इसका श्रीरामचरितमानस में कहीं उल्लेख नहीं है। जबकि बालकाण्ड की इस चौपाई में रावण के आने और भागे जाने का स्पष्ट उल्लेख है।
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू॥
रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥1॥
भावार्थ:-राजाओं की भुजाओं का बल चन्द्रमा है, शिवजी का धनुष राहु है, वह भारी है, कठोर है, यह सबको विदित है। बड़े भारी योद्धा रावण और बाणासुर भी इस धनुष को देखकर गौं से (चुपके से) चलते बने (उसे उठाना तो दूर रहा, छूने तक की हिम्मत न हुई)॥
*झूठी खबर छापता है दैनिक भास्कर*
आज के दैनिक भास्कर में एक लेख है कि सीता जी के स्वयंवर में रावण नहीं आया था और इसका श्रीरामचरितमानस में कहीं उल्लेख नहीं है। जबकि बालकाण्ड की इस चौपाई में रावण के आने और भागे जाने का स्पष्ट उल्लेख है।
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू॥
रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥1॥
भावार्थ:-राजाओं की भुजाओं का बल चन्द्रमा है, शिवजी का धनुष राहु है, वह भारी है, कठोर है, यह सबको विदित है। बड़े भारी योद्धा रावण और बाणासुर भी इस धनुष को देखकर गौं से (चुपके से) चलते बने (उसे उठाना तो दूर रहा, छूने तक की हिम्मत न हुई)॥
*झूठी खबर छापता है दैनिक भास्कर*
आज के दैनिक भास्कर में एक लेख है कि सीता जी के स्वयंवर में रावण नहीं आया था और इसका श्रीरामचरितमानस में कहीं उल्लेख नहीं है। जबकि बालकाण्ड की इस चौपाई में रावण के आने और भागे जाने का स्पष्ट उल्लेख है।
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू॥
रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥1॥
भावार्थ:-राजाओं की भुजाओं का बल चन्द्रमा है, शिवजी का धनुष राहु है, वह भारी है, कठोर है, यह सबको विदित है। बड़े भारी योद्धा रावण और बाणासुर भी इस धनुष को देखकर गौं से (चुपके से) चलते बने (उसे उठाना तो दूर रहा, छूने तक की हिम्मत न हुई)॥

यह एक तस्वीर है 1948 के ओलंपिक की जो लंदन में हुआ था। हमारी फुटबॉल टीम ने फ्रांस के साथ मैच 1-1 से बराबर किया था। हमारे खिलाड़ी इसलिए जीत न सके क्योंकि उनके पास जूते ही नहीं थे , और वह नंगे पैर पूरा मैच खेले थे।जिसके कारण बहुत ही खिलाडियों को दूसरी टीम के खिलाडियों के जूतों से चोट भी लगी थी।फिर भी मुकाबला बराबरी का रहा।
इस टीम के कप्तान थे शैलेन्द्र नाथ मन्ना। वो विश्व के बेहतरीन खिलाडियों मैं से एक थे।
अब इसका दूसरा पहलू सुनिये , सरकार ने जूते क्यों नहीं दिए क्योंकि सरकार के पास इतने पैसे भी नही थे।यह वो वक्त था जब नेहरू के कपड़े पेरिस से ड्राइक्लीन हो कर आते थे।और साहब अपने कुत्ते के साथ प्राइवेट जेट मैं घूमते थे।
नतीजा यह हुआ के फीफा ने 1950 वर्ड कप मैं इंडिया को बैन कर दिया क्योंकि बिना जूते के कोई भी टीम मैच नही खेल सकती थी।
फिर कभी भारतीय टीम फीफा वर्ड कप मैं नही गई।