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जो चूक हमारे पूर्वजों ने की थी,
वह छत्रपति शिवाजी महाराज ने नहीं किया था । पकङे गए शत्रू को कभी भी जीवनदान नहीं दिया .. उलटा ऐसी मौत दी कि, मुगल निज़ाम भयाक्रान्त रहने लगे ।
सवा लाख की सेना लेकर आए अफज़ल खान का वध करने के उपरान्त उसका मस्तक काटकर,शत्रु के सामने से लाकर प्रतापगढ़ के द्वार पर लटका दिया था ।
यह थे वीर शिवा जी 🚩🚩
शिवाजी का मार्ग चुनने की आवश्यकता है.।
जय भवानी 🔥

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मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह जी की संक्षिप्त जीवनी :-

जन्म : 16 मार्च, 1559 ई.

1582 ई. :- दिवेर युद्ध में सेनापति बने व अकबर के सेनापति सुल्तान खां को उसके कवच व घोड़े समेत भाले से कत्ल किया

1587 ई. :- गुजरात के एक शाही थाने पर विजय प्राप्त की

1599 ई. :- अकबर ने राजा मानसिंह व अपने बेटे सलीम (जहांगीर) को महाराणा अमरसिंह के खिलाफ मेवाड़ भेजा। सलीम ने उदयपुर पर हमला किया। महाराणा अमरसिंह ने मुगल फौज को आमेर तक खदेड़ दिया व मालपुरा से जुर्माना वसूल करते हुए मेवाड़ आए।

महाराणा अमरसिंह ने अपने हाथों से सुल्तान खां खोरी को मारकर बागोर पर अधिकार किया व इसी तरह रामपुरा पर भी अधिकार किया।

1600 ई. :- अकबर ने मिर्जा शाहरुख को फौज समेत मेवाड़ भेजा, पर महाराणा के खौफ से मिर्ज़ा भागकर बांसवाड़ा चला गया।

महाराणा अमरसिंह ने अपने हाथों से ऊँठाळा दुर्ग में तैनात कायम खां को मारकर दुर्ग पर अधिकार किया।

1603 ई. :- अकबर ने शहजादे सलीम को दोबारा मेवाड़ भेजा, पर महाराणा अमरसिंह से मिली पिछली पराजय से घबराकर वह मेवाड़ अभियान छोड़कर गुजरात चला गया।

1605 ई. :- जहांगीर मुगल बादशाह बना व उसने आसफ खां और शहजादे परवेज को 50 हज़ार की फ़ौज समेत मेवाड़ भेजा।

1606 ई. :- देबारी के युद्ध में महाराणा अमरसिंह ने शहजादे परवेज को पराजित किया।

1608 ई. :- जहांगीर ने शहजादे परवेज को बुलाकर महाबत खां को 15 हज़ार की फौज समेत मेवाड़ भेजा। महाराणा अमरसिंह ने महाबत खां को पराजित किया।

1609 ई. :- महाराणा अमरसिंह ने मांडल के थाने पर हमला किया, जहां मुगल फौज का सेनापति जगन्नाथ कछवाहा घावों के चलते कुछ दिन बाद मारा गया, जिसकी 32 खंभों की छतरी भीलवाड़ा के मांडल में स्थित है।

1609 ई. :- जहांगीर ने फौज समेत अब्दुल्ला खां को मेवाड़ भेजा।

1611 ई. :- रणकपुर के युद्ध में महाराणा अमरसिंह ने अब्दुल्ला खां को पराजित किया।

1611 ई. :- जहांगीर ने अब्दुल्ला खां को बुलाकर राजा बासु को मेवाड़ भेजा।

1613 ई. :- महाराणा अमरसिंह ने शाहबाद थाने पर हमला किया, जिसमें राजा बासु मारे गए।

1613 ई. :- जहांगीर ने फौज समेत मिर्जा अजीज कोका को मेवाड़ भेजा, पर वह भी महाराणा अमरसिंह से पराजित हुआ।

1613 ई. :- जहांगीर अजमेर पहुंचा और वहां से उसने शाहजहां को समूचे मुगल साम्राज्य की फौज समेत मेवाड़ भेजा। डेढ़ वर्ष तक 20 हजार मेवाडी बहादुरों ने तकरीबन 4 लाख से अधिक फ़ौज से छापामार संघर्ष जारी रखा।

1615 ई. :- मेवाड़ के बन्दी नागरिकों की रक्षा की खातिर महाराणा अमरसिंह ने मुगलों से सन्धि कर ली। सन्धि के बाद चित्तौड़ पर महाराणा अमरसिंह का अधिकार हुआ।

1615 ई. से 1620 ई. :- महाराणा अमरसिंह संधि की ग्लानि से उदयपुर में एकान्तवास में रहे।

26 जनवरी, 1620 ई. :- महाराणा अमरसिंह का देहान्त

एक ऐसे योद्धा, जिन्होंने अपने जीवनकाल में महाराणा बनने के बाद 18 वर्षों तक संघर्ष करते हुए 17 बड़ी लड़ाईंयों में बहादुरी दिखाई व 100 से अधिक मुगल थानों पर विजय प्राप्त की

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हूं लड्यो घणो, हूं सह्यो घणो, मेवाडी मान बचावण नै |
में पाछ नहीं राखी रण में, बैरया रो खून बहावण नै ||

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ना वे धर्म जात में बँटता,ना ही कुटुम कबीलां में।
पिढ्यां खुद री रण में मेली, राखण खुशियाँ थारा कबीलां में॥
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भावार्थ - वे (राजपूत) ना ही धर्म-जाति में बँटे और ना ही कुटुम्ब-कबीलों में।
उन्होंने किसी भी धर्म-जाति का भेद किये बिना दूसरे समाजों(कबीलों) की सुरक्षा में अपनी कईं पीढ़ियों को युद्धभूमि में भेजा।
फ़ोटो : गुजरात के प्रसिद्ध लोकदेवता विर वच्छराज दादा सोलंकी की है।
जय राजपूताना🙏🚩

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