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जब तक जीव ऐसी मौत मरते रहेंगे तब तक इंसान का भी भला नहीं हो सकता !!

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इंसानों को उसके गुनाह की सजा अगर साथ साथ मिल जाए तो गुनाह शब्द ही इस धरती से मिट जाए 🤬🤬🤬
कैसे हम एक सभ्य मासूम जीव का दूध निकाल कर उसके बच्चे मार कर फिर उसको भी मार कर खा जाते है और खुद को इंसान बताते है 😓😓

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भोजन नहीं यह हिंसा है हत्या है एक जीव की एक आत्मा की !!

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यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत चुण्डावत की रानी थी | जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले ही उसके पति रावत चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला |
नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़ कर रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नही हो रहा था यह बात रानी को पता लगते ही उसने तुंरत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरता पूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया | युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नही त्याग पा रहे थे सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रणवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा |
सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोच कर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के चलते इस वीर रानी ने अपना शीश काट कर ही निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके |
और रावत चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गया |

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बहन साक्षी मालिक आप पर हमे बहुत गर्व और फक्र है, आपने पूरी दुनिया मे देश का मान ऊँचा किया है, भारत की महान रेशलर साक्षी मालिक ने किया कुस्ती को अलविदा

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खालसा फौज के #कमांडर_इन_चीफ ब्राह्मण योद्धा #पण्डित_दीवान_चन्द_मिश्र :- #nkv

पण्डित दीवान चंद मिश्र महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल के ऐसे शक्तिशाली/योद्धा सेनापति थे जिन्होंने मुल्तान और काश्मीर पर विजय प्राप्त करने वाली सेनाओं के #चीफ_ऑफ_आर्टिलरी और #कमांडर_इन_चीफ के पद से ले कर, 1816 से 1825 तक खालसा सेना के #कमांडर_इन_चीफ के पद में भी काम किया।
पण्डित दीवान चन्द मिश्र महाराजा रणजीत सिंह के लाहौर दरबार के आधार स्तंभो में से एक थे।

पण्डित दीवान चंद गोंदलनवाला गाँव (वर्तमान में गुजरांवाला , पाकिस्तान ) के एक ब्राह्मण दुकानदार के पुत्र थे।

पण्डित दीवान चंद जी की बहादुरी से प्रसन्न हो महाराजा रणजीत सिंह की ने से #जफर_जंग_बहादुर (युद्धों के विजेता) की उपाधि से सम्मानित किया गया था ।

पण्डित दीवान चंद जी को 1816 में आर्टिलरी चीफ के पद से खालसा सेना के मुख्य कमांडर के पद पर पहुंचे। उन्होंने मीठा तिवाना के टीवाना नवाब के विद्रोह को दबा दिया और उन्हें महाराजे के आगे श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए मजबूर किया।

पण्डित जी ने 1818 में मुल्तान फतह कर उसपर कब्जा किया और युद्ध मे मुजफ्फर खान और उनके सात बेटे को मार गिराया।

1819 में, उन्होंने काश्मीर क्षेत्र में शोपियां के लिए युद्ध अभियान का नेतृत्व किया और इस युद्ध मे दुर्रानी (अफगान) के गवर्नर जब्बार खान को हरा दिया। उन्होंने कुछ ही घंटों में अफगानों को हरा कर घुटनो के बल ला दिया।

1821 में मनकेरा ( वर्तमान मनकेरा तहसील ) को फतह कर अपने अधिकार में लिया और फिर बटाला, पठानकोट, मुकेरियां, अकालगढ़ आदि पर भी विजय प्राप्त की।
पंडित जी ने पेशावर और नौशेरा की युद्धो में भी भाग लिया औऱ फतह हासिल की।

महाराजा रणजीत सिंह का अपने इस योद्धा सेनापति के प्रति इतना सम्मान और प्रेम था कि एक बार अमृतसर में, महाराजा ने एक व्यापारी से एक बहुत कीमती हुक्का खरीदा था (हालांकि यह उनके अपने पंथ के निषेध के खिलाफ था) महाराजे ने उच्च सम्मान के चिह्न पर मिश्र दीवान चंद जी को हुक्का भेंट किया, और उन्हें धूम्रपान करने की भी अनुमति दी गई थी।

महाराजा के साम्राज्य के निर्माण में पंडित दीवान चंद मिश्र के योगदान को पंथक और ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी कम करके लिखा है, जिन्होंने उन्हें "हुक्का पीने वाला जनरल" बताया है।

वे सच मे लाहौर दरबार के आधार स्तम्भो में से एक ऐसे महान योद्धा, सेनापति थे जिनको खुद महाराजा रणजीत सिंह ने #फतेह_ओ_नुसरत_नसीब (जो कभी युद्ध में नहीं हारा) और #जफर_जंग_बहादुर (युद्धों में विजेता) की उपाधि प्रदान की और उन्हें कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया।

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भोजपाली बाबा: श्रीराम मंदिर बनने तक शादी न करने का लिया था संकल्प, अब अयोध्या से आया निमंत्रण
"मुझे भरोसा नहीं था कि रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण आएगा और जब आया तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा." ये शब्द हैं रविन्द्र गुप्ता उर्फ भोजपाली बाबा के. मध्य प्रदेश के बैतूल में सनातन धर्म का प्रचार कर रहे भोजपाली बाबा को अयोध्या श्रीराम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण आया है. निमंत्रण आने से बाबा खुश हैं और उनके भक्तों में भी खुशी है. बाबा ने संकल्प लिया था कि जब तक भव्य राम मंदिर नहीं बनेगा तब तक अविवाहित रहेंगे. बाबा का संकल्प पूरा हो गया और गांव वाले उन्हें अयोध्या भेजने की तैयारी कर रहे हैं.
दरअसल, भोजपाली बाबा ने 32 साल पहले जब वे 21 के थे, तब श्री राम मंदिर के भव्य निर्माण को लेकर संकल्प लिया था कि जब तक मंदिर नहीं बनेगा तब तक भी अविवाहित रहेंगे. राम मंदिर निर्माण को लेकर उन्होंने अपना परिवार त्याग दिया और संत बन गए. अब सनातन धर्म का प्रचार कर रहे हैं और समाज सेवा कर रहे हैं. अब भोजपाली बाबा 52 साल के हो गए हैं और अयोध्या जाने की तैयारी कर रहे हैं.

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