Discover postsExplore captivating content and diverse perspectives on our Discover page. Uncover fresh ideas and engage in meaningful conversations
भगवान श्रीरामचन्द्र जी जब महर्षि विश्वामित्र कि सलाह पर मिथिला नरेश राजा जनक कि राज्यसभा में धनुषयज्ञ देखने गये।
उनके सौंदर्य, सौम्यता को देखकर जनकपुर के लोग मोहित थे। सभी चाहते थे कि विधि का विधान ऐसा हो कि जनकनन्दिनी सीताजी का विवाह श्रीराम से हो जाय। लेकिन शिव धनुष का विचार आने लोग दुखी हो जाते थे। यह बालक कैसे विश्वप्रसिद्ध शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा सकता है।
जनक कि सभा में राजा, महाराजा , शूरवीर, देव लोग धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना तो क्या, उठा भी नही पाये। स्थिति यहां तक आ गई कि कई लोग एक साथ मिलकर धनुष उठा न पाये।
जनक हताशा में बोले-
वीर विहीन महि मैं जानी।
इन समस्त घटनाक्रम में जो तथ्य अनुकरणीय है। वह है मर्यादापुरुषोत्तम भगवान राम का जो मौन, स्थिर, सौम्यता के साथ बैठे है। यह तो उनको भी विदित है। इस धनुष पर वह क्षणमात्र में प्रत्यंचा चढ़ा सकते थे। फिर भी न उनमें व्यग्रता है, न हताशा है। यद्दपि सीता जी को वह वरण करना चाहते हैं। लेकिन उनके लिये यह आनंदित करने वाली बात नही है। कोई धनुष उठा नही पाया।
वह मंद मंद मुस्कान के साथ धनुषयज्ञ देख रहें है।
वाल्मीकि रामायण में अगस्त ऋषि भगवान राम के विषय में कहते हैं। योग और ध्यान के समस्त आयामों, केंद्रों पर उनका नियंत्रण था। उनके लिये हर परिस्थिति एक जैसी है।
जनक कि सभा में यह दिखता भी है। वह धनुष तोड़ने तभी उठते है। जब विश्वामित्र जी आग्रह करते है। धनुष तोड़ने के जाते हुये भी कोई हर्ष विषाद नही है। उनका समस्त लौकिक जीवन इन सभी से उपर है। यह गीता का साक्षी भाव है।धनुष बड़ी सरलता से उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाते है तो वह टूट जाती है। जैसे कुछ हुआ ही नही है।
राम का चिंतन इस संसार मे रहकर हमें असांसरिक बनता है। कैसे वनवास मिलने पर दुखी नही होना है। धनुषयज्ञ में विजयी होने पर हर्षित नही होना है।