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नवबौद्ध कह रहे हैं कि #chhath उनका पर्व है। नहीं घोंचुओ, ऐसा नहीं है। सूर्य की स्तुति, उपासना एवं उनसे जुड़े वैज्ञानिक सिद्धांतों का इतिहास ऋग्वेद तक जाता है। रामायण में जिक्र है। महाभारत में इस संबंध में आपको कथा मिलेगी।
महाभारत में जुए के खेल के बाद पांडवों को वनवास दिया गया। जब वो वहाँ जाने को उद्यत हुए तो उनके पास धन-धान्य तो छोड़िए, 2 समय के भोजन तक की समस्या आन खड़ी हुई थी। ऐसे समय में वो अपने पुरोहित धौम्य के पास पहुँचे, जिन्होंने उन्हें भगवान सूर्य की आराधना करने के लिए कहा। अतः, महाभारत में #chhathpuja का बड़ा स्पष्ट वर्णन है। इसे सूर्य षष्ठी भी कहा जा सकता है। महाभारत के वन पर्व के तीसरे अध्याय में ये पूरी कथा है, जिसमें युधिष्ठिर ने धमय द्वारा बताए गए 108 नामों से भगवान भास्कर की आराधना की।
धर्मराज चूँकि भाइयों में सबसे बड़े थे, वो इस संकट में थे कि बाक़ी के भाइयों और द्रौपदी का भरण-पोषण वो वन में कैसे करेंगे। ब्राह्मणों का सत्कार कैसे करेंगे। कई ब्राह्मण स्नेहवश उनके साथ वन में जाने के लिए उद्यत थे, जबकि युधिष्ठिर उन्हें समझाए जा रहे थे कि वो उनके साथ न चलें, वो उनका सत्कार करने में समर्थ नहीं हैं। इसके बावजूद वो ब्राह्मण कह रहे थे कि हम स्वयं ही अन्न जुटाने में समर्थ हैं और आप पर भार नहीं बनेंगे, कथाओं के माध्यम से आपका उत्साहवर्धन और ज्ञानवर्धन करते रहेंगे। फिर भी धर्मराज तो धर्मराज थे। वो पहुँच गए धौम्य के पास मार्गदर्शन के लिए। इस दौरान उन्होंने बड़ी ही गूढ़ बात कही। पुरोहित धौम्य ने इस दौरान उन्होंने उत्तरायण और दक्षिणायन के वैज्ञानिक महत्व को समझाया। उत्तरायण के दौरान सूर्य पृथ्वी के रस को खींचते हैं और दक्षिणायन के दौरान उस रस से पृथ्वी को पुष्ट करते हैं। कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ने से लेकर मकर रेखा पर सीधी पड़ने तक की 6 महीने की अवधि दक्षिणायन होती है। जबकि जनवरी से जून तक उत्तरायण होता है। उत्तरायण खत्म होने पर वृष्टि प्रारंभ हो जाती है, धरती पर हरियाली छा जाती है और भोजन की कमी नहीं रहती। धौम्य ने समझाया कि प्राचीन काल में अन्न के लिए व्याकुल जनता का भगवान आदित्य ने इसी तरह कल्याण किया था। सोचिए, हजारों वर्ष पूर्व हमारी वैज्ञानिक चेतना कितनी समृद्ध थी, सजग थी।
धौम्य समझाते हैं कि ये मेघ जो हैं, वो सूर्य के ही तेज के रूप हैं। बिलकुल सही बात है। ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि सूर्य की गर्मी से धरती का जल वास्प में बदल कर उच्च ऑल्टीट्यूड पर स्थित होता है और बादल या मेघ बनता है। अब रिसर्च में सामने आ रहा है कि 1 प्रतिशत ही सही लेकिन चन्द्रमा का भी वर्षा में योगदान है। धौम्य ने तभी कह दिया था। शुक्ल पक्ष में पेड़-पौधों में रस का प्रवाह तेज़ होता है। अतः, चन्द्रमा को औषधियों का स्वामी कहा गया है। अन्न भी औषधि है। चाँदनी उन्हें पुष्ट करती है। जो भरण-पोषण करता है, वही पिता है। अतः, सूर्य को धौम्य ने समस्त प्राणियों का पिता बताया। युधिष्ठिर से कहा कि जाओ उनकी उपासना करो, अन्न की कमी नहीं रहेगी। इसके बाद गंगाजी में स्थित होकर युधिष्ठिर ने विभिन्न प्रकार के नैवेद्य एवं पुष्पों के माध्यम से छठ का व्रत किया। षष्ठी और सप्तमी तिथि के अनुष्ठान पूर्ण किए। उन्होंने गंगाजल से स्वयं को पवित्र किया, वाणी को वश में किया, चित्त को एकाग्र किया, इन्द्रियों को संयमित किया और फिर सिर्फ वायु पीकर रहने लगे। अर्थात, निर्जला व्रत। सूर्य के सम्मुख खड़े होकर उन्होंने उपासना की। सूर्य ब्रह्माण्ड के नेत्र हैं, अर्थात उनके बिना प्राणी अंधे हो जाएँगे, भूख-प्यास से व्याकुल हो जाएँगे। महाभारत में जो तांबे के अक्षय पात्र की कथा है, वो पांडवों को छठ के बाद प्राप्त होती है। अक्षय पात्र क्या है? सूर्य के गमन की प्रक्रिया, मौसम विज्ञान और चन्द्रमा के किरणों का रहस्य जो समझ लेता है वो कृषि कार्य में उत्तम होगा और जहाँ भी रहेगा उस भूमि से अक्षय अन्न उपजाएगा।
युधिष्ठिर ने सूर्य को सांख्य योगियों का प्राप्तव्य और कर्म योगियों का आश्रय बताया गया है। सांख्य एवं कर्म योगी बुद्ध के जन्म के हजारों वर्ष पूर्व से अस्तित्व में है और इन पर ऋषिगण शोध में रत रहते थे। पंच महाभूत से बनी प्रकृति और पुरुष अर्थात जीवात्मा - जड़ और चेतन के संयोग पर शोध सांख्य से ही निकला है। इस जगत के 3 गुणों सत्, रजस् तथा तमस् का अध्ययन कर के शंकाओं का समाधान किया गया। इसी तरह कर्म सिद्धांत कहता है कि हमारा स्वरूप बहुत व्यापक है और हम जन्म-जन्मांतर से कर्म-फल चक्र में फँसे हुए हैं। इसमें आत्मा के अमर होने का सिद्धांत दिया गया और बताया गया कि हमारी क्रियाएँ आत्मा से चिपकी हुई हैं। युधिष्ठिर इसीलिए सूर्य की उपासना करते समय सांख्य और कर्म का जिक्र करते हैं। नवबौद्धों को समझ नहीं आएगा।