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मेरा, गिरधारी लाल गोयल और Ajit Singh रामदासजी का विद्यालय में योग करते हुए दुर्भभ छायाचित्र

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भांजे Nitin Tripathi क्या इंटलीजेंस इमेजिनेशन ने इतनी तरक़्क़ी नही कि जो एक पिता की मार्मिक भावनाओं को समझ सके बे।।
कैसे उस नन्ही सी जान ने थैले में अंतिम यात्रा की होगी।।
कई मामलों में मामाश्री क्रुर ह्रदय के रहे लेक़िन आज इस ख़बर को सुनकर कलेजा हाथ मे आ गया।।
वाक़ई हमने बहुत प्रगति की है गिरधर।
याद रखना गरीब होना सबसे बड़ा अभिश्राप है इस दुनियां में।।
भगवान नननिये की आत्मा को शान्ति प्रदान करे और उस पिता को पहाड़ सी हिम्मत।।

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द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त "श्री कृष्ण" अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि हे पार्थ...: तराजू पर पैर संभलकर रखना... संतुलन बराबर रखना... लक्ष्य मछली की आंख पर ही केंद्रित हो उसका खास खयाल रखना......तो अर्जुन ने कहा : "हे प्रभु" सबकुछ अगर मुझे ही करना है , तो फिर आप क्या करोगे??

वासुदेव हंसते हुए बोले: हे पार्थ , जो आप से नहीं होगा वह में करुंगा
पार्थ ने कहा : प्रभु ऐसा क्या है जो मैं नहीं कर सकता ??

वासुदेव फिर हंसे और बोले: जिस अस्थिर , विचलित , हिलते हुए पानी में तुम मछली का निशाना साधोगे.... उस विचलित "पानी" को स्थिर "मैं" रखुंगा .......

कहने का तात्पर्य यह है कि आप चाहे कितने ही निपुण क्यूँ ना हो, कितने ही बुद्धिमान क्यूँ ना हो , कितने ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हो, लेकिन आप स्वंय हर परिस्थिति के ऊपर पूर्ण नियंत्रण नहीँ रख सकते .... आप सिर्फ अपना प्रयास कर सकते हैं.... लेकिन उसकी भी एक सीमा है।

और जो उस सीमा से आगे की बागडोर संभालता है उसी का नाम "भगवान" है .....

शुभप्रभात।।
जय श्री राम।।

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अपने हिस्से का खा गए और इनके हिस्से का जला दिये।।
प्रलय नही तो क्या फुल बरसेंगे बे।।

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बुद्ध अवतार :

धर्म ग्रंथों के अनुसार बौद्धधर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध भी भगवान विष्णु के ही अवतार थे परंतु पुराणों में वर्णित भगवान बुद्धदेव का जन्म गया के समीप कीकट में हुआ बताया गया है और उनके पिता का नाम अजन बताया गया है। यह प्रसंग पुराण वर्णित बुद्धावतार का ही है।

एक समय दैत्यों की शक्ति बहुत बढ़ गई। देवता भी उनके भय से भागने लगे। राज्य की कामना से दैत्यों ने देवराज इन्द्र से पूछा कि हमारा साम्राज्य स्थिर रहे, इसका उपाय क्या है। तब इन्द्र ने शुद्ध भाव से बताया कि सुस्थिर शासन के लिए यज्ञ एवं वेदविहित आचरण आवश्यक है। तब दैत्य वैदिक आचरण एवं महायज्ञ करने लगे, जिससे उनकी शक्ति और बढऩे लगी। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने देवताओं के हित के लिए बुद्ध का रूप धारण किया। उनके हाथ में मार्जनी थी और वे मार्ग को बुहारते हुए चलते थे।

इस प्रकार भगवान बुद्ध दैत्यों के पास पहुंचे और उन्हें उपदेश दिया कि यज्ञ करना पाप है। यज्ञ से जीव हिंसा होती है। यज्ञ की अग्नि से कितने ही प्राणी भस्म हो जाते हैं। भगवान बुद्ध के उपदेश से दैत्य प्रभावित हुए। उन्होंने यज्ञ व वैदिक आचरण करना छोड़ दिया। इसके कारण उनकी शक्ति कम हो गई और देवताओं ने उन पर हमला कर अपना राज्य पुन: प्राप्त कर लिया।

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