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पापा ❤️

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प्रेम गुरु का...🤗🤗
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Happy Makar Sankranti 🔥
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In the middle of chemotherapy, a tough-looking male nurse chose kindness over convention. Wearing a pink tutu, he stepped into a hospital room just to make a sad little girl smile. That innocent laughter says it all—sometimes humanity, empathy, and a small gesture become the most powerful medicine of all.
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मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं
🙏🙏🙏🙏🙏
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🕉️ नंदा राजजात यात्रा – हिमालय की आस्था, परंपरा और भक्ति का महासंगम 🏔️
उत्तराखंड की धरती पर सदियों से चली आ रही नंदा राजजात यात्रा केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि देवी नंदा (माँ पार्वती) को उनके मायके से ससुराल कैलाश तक विदा करने की दिव्य परंपरा है।
इसे यूँ ही नहीं कहा जाता — “हिमालय का कुम्भ” ✨
📜 पौराणिक कथा
मान्यता है कि देवी नंदा हर 12 वर्ष में अपने मायके गढ़वाल आती हैं और फिर भव्य राजकीय यात्रा के साथ कैलाश के लिए विदा होती हैं। यही विदाई नंदा राजजात के रूप में मनाई जाती है।
🏔️ हजारों साल पुरानी परंपरा
इस यात्रा की शुरुआत कत्यूरी राजाओं के काल से मानी जाती है, जिसे बाद में चंद वंश और गढ़वाल नरेशों का संरक्षण मिला।
👉 लगभग 1000 वर्षों से अधिक पुरानी यह परंपरा आज भी जीवंत है।
🐏 चौंसिंगा – चार सींग वाला मेढ़ा
नंदा राजजात की सबसे अनोखी पहचान!
यह मेढ़ा देवी नंदा का प्रतीक माना जाता है और यात्रा के अंत में रूपकुंड के पास अदृश्य हो जाना देवी की कैलाश-विदाई का संकेत माना जाता है।
🚶‍♂️ कठिन लेकिन दिव्य यात्रा मार्ग
नौटी (चमोली) → कांसुवा → सेम → पातर नचौनी → रूपकुंड → होमकुंड
लगभग 280–300 किमी की यह यात्रा ग्लेशियरों, ऊँचे दर्रों और दुर्गम पहाड़ों से होकर गुजरती है।
🧿 संस्कृति और आस्था का उत्सव
ढोल-दमाऊ की गूंज, जागर, लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक वेशभूषा में हजारों श्रद्धालु — यह यात्रा गढ़वाल–कुमाऊँ की साझा सांस्कृतिक आत्मा है।
🕰️ ऐतिहासिक नंदा राजजात
1905 | 1929 | 1953 | 1976 | 1987 | 2000 | 2014
➡️ अगली पूर्ण नंदा राजजात: अगस्त-सितंबर 2026 (संभावित)
🌸 निष्कर्ष
नंदा राजजात यात्रा आस्था, प्रकृति-पूजन और हिमालयी संस्कृति की अमूल्य धरोहर है — जहाँ भक्ति थकती नहीं और श्रद्धा कभी हारती नहीं। 🙏
🚩 जय माँ नंदा! जय हिमालय! 🚩
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