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इरादा अगर चट्टान जैसा मज़बूत हो, तो ज़मीन से पानी निकालना कोई बड़ी बात नहीं। ओडिशा के कंदलेई गाँव की शकुंतला चतर ने यही कर दिखाया है! 🫡🇮🇳
जंगल के बीच बसे एक छोटे से गाँव में जहाँ 42 आदिवासी परिवार सालों से बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे थे, वहाँ 35 साल की शकुंतला ने वो कर दिखाया जो बड़ी-बड़ी मशीनें नहीं कर पाईं। गाँव में तीन हैंडपंप थे, लेकिन कोई खराब था तो कोई ज़हरीला पानी दे रहा था। लोग प्यासे थे और प्रशासन सोया हुआ था।
शकुंतला ने किसी मसीहा का इंतज़ार नहीं किया।
60 दिनों का संघर्ष: हर दिन 3-4 घंटे की कड़ी मेहनत और अकेले 50 फीट गहरा कुआँ खोद डाला।
अनोखी सूझबूझ: कुआँ खोदते समय जो मिट्टी निकली, उसे फेंका नहीं, बल्कि उससे 4,000 ईंटें बनाईं और अपना खुद का टूटा हुआ घर भी मरम्मत कर लिया।
पूरे गाँव की प्यास बुझाई: आज न सिर्फ शकुंतला का परिवार, बल्कि गाँव के कई घर इसी कुएं से साफ़ पानी पी रहे हैं।
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि बदलाव के लिए किसी बड़ी डिग्री या सरकारी बजट की नहीं, बल्कि एक मज़बूत 'ज़िद' की ज़रूरत होती है। शकुंतला चतर सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल हैं। देश की इस 'वॉटर वॉरियर' को हमारा सादर नमन! 🫡🇮🇳❤️✨
"ईमानदारी से बताइए, क्या हमें आज भी बदलाव के लिए सरकारों के भरोसे बैठना चाहिए? शकुंतला जी के इस फौलादी हौसले के लिए कमेंट्स में एक ❤️ ज़रूर लिखें! 👇🔥🇮🇳🫡"
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