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दत्तक ग्रहण की नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है। इसका दायित्व देश के भीतर और अंतर-देशीय दत्तक ग्रहण प्रक्रियाओं की निगरानी और नियमन करना है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई नया सामाजिक रुझान नहीं है, बल्कि वास्तविकता यह है कि अधिक संख्या में बच्चियों को छोड़ा या त्यागा जा रहा है, जिसके कारण वे गोद लेने के लिए अधिक उपलब्ध हो जाती हैं।

बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था HAQ: सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स की सह-संस्थापक और कार्यकारी निदेशक भारती अली के अनुसार, “यह बढ़ोतरी इसलिए दिखाई दे रही है क्योंकि अधिक बच्चियां उपलब्ध हैं। समाज में आज भी बेटियों को छोड़े जाने की घटनाएं अधिक हैं।” इसी बात से सहमत होते हुए बाल अधिकार कार्यकर्ता एनाक्षी गांगुली ने भी कहा कि अधिक बच्चियों के परित्याग या आत्मसमर्पण के कारण ही उन्हें गोद लिए जाने की संख्या अधिक होती है।

CARA ने अपने एक हलफनामे में बताया कि दत्तक ग्रहण के लिए उपलब्ध बच्चों को पांच श्रेणियों में रखा गया है—अनाथ, परित्यक्त, आत्मसमर्पित, अयोग्य माता-पिता वाले बच्चे और लंबे समय तक मुलाकात न होने के मामले। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, अब तक 7 से 11 वर्ष और 12 से 18 वर्ष आयु वर्ग के कुल 20,673 बच्चों की पहचान की जा चुकी है, जो इन श्रेणियों में आते हैं।

हालांकि, दस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों—अरुणाचल प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, केरल, लद्दाख, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और मणिपुर—ने इस अवधि में हुए कुल दत्तक ग्रहण का डेटा उपलब्ध नहीं कराया है। वहीं पंजाब में हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA) के तहत कुल 7,496 दत्तक ग्रहण दर्ज किए गए, जिनमें से 4,966 बच्चियां और 2,530 बच्चे थे। इसके विपरीत, तेलंगाना में HAMA के अंतर्गत दत्तक ग्रहण में दंपतियों की प्राथमिकता लड़कों की ओर अधिक पाई गई।

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने 15 मार्च को देश के 370 जिलों में विशेषीकृत दत्तक ग्रहण एजेंसियों (Specialised Adoption Agencies – SAAs) की स्थापना न होने पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि उसके निर्देशों का पालन नहीं किया गया तो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के खिलाफ कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि देश के कुल 760 जिलों में से 370 जिलों में अभी तक कार्यशील SAAs नहीं हैं, जबकि किशोर न्याय अधिनियम के तहत यह एक अनिवार्य कानूनी आवश्यकता है।

SAAs का मुख्य कार्य संभावित दत्तक माता-पिता की होम स्टडी रिपोर्ट तैयार करना होता है। पात्र पाए जाने पर, वे कानूनी रूप से दत्तक ग्रहण के लिए मुक्त घोषित बच्चे को, उसकी बाल-अध्ययन रिपोर्ट और मेडिकल रिपोर्ट के साथ दंपति को सौंपते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे 7 अप्रैल तक महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को SAAs की स्थिति और दत्तक ग्रहण से संबंधित नवीनतम आंकड़े उपलब्ध कराएं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि अदालत के आदेशों का जमीनी स्तर पर कोई प्रभाव पड़ा है या नहीं।

केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने भी कहा कि अदालत के आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन और दत्तक प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए राज्यों को समय पर सही आंकड़े मंत्रालय को उपलब्ध कराने चाहिए। यह पूरा मुद्दा न केवल दत्तक व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है, बल्कि समाज में बच्चियों के प्रति दृष्टिकोण पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

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जब पूरा देश लियोनेल मेसी से मिलने की तस्वीरों और चर्चाओं में डूबा हुआ था, तब विराट कोहली ने एक अलग ही रास्ता चुना। उन्होंने भीड़ और सुर्खियों से दूर जाकर प्रेमानंद जी महाराज के दर्शन किए। यह कदम दिखाता है कि विराट के लिए आंतरिक शांति, आस्था और आध्यात्मिक संतुलन उतना ही महत्वपूर्ण है जितना मैदान पर सफलता। यह मुलाकात उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को सामने लाती है, जहां विनम्रता और आत्मिक जुड़ाव सबसे ऊपर है।

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संविधान की भावना को साकार करता उत्तराखण्ड
हर नागरिक के लिए समान कानून वाला पहला राज्य
#bjp4uk #bjpukgov #dhamigovernment #goodgovernance #समाननागरिकसंहिता #ucc

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35 करोड़ सवर्ण समाज से कौन कौन UGC काले कानून के खिलाफ महाआंदोलन का समर्थन करते?
कमेंट में अपनी राय जरूर दे।
सवर्ण समाज एकता जिंदाबाद 🚩

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सवर्ण समाज के नवजवानों इसी तरह सोशल मीडिया पर गर्दा उड़ाते रहो, आप लोगों के वजह से ही UGC पर देश की नेशनल मीडिया में डिबेट चालू हो गया है।
सभी सवर्ण भाई कमेंट में अपनी राय देते रहे।

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UGC के नए नियमों के खिलाफ आक्रोश जारी,
आज लखनऊ में निकाल रही पैदलमार्च राजपूत करणी सेना, महाआंदोलन की तैयारी शुरू।
सभी सवर्ण समाज के भाई सोशल मीडिया और धरातल दोनों जगह इस काले कानून का विरोध करो।

कमेंट में एकता का परिचय देते हुए सभी अपनी राय जरूर देना,

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देश में 100 से ज़्यादा सवर्ण सांसद बैठे हैं,
फिर भी UGC जैसा कानून बिना विरोध के आ गया।
इसका मतलब साफ़ है— मुद्दा संख्या का नहीं, नीयत का है, इन नेताओं की प्राथमिकता समाज नहीं, सत्ता है।
चुनाव के समय सवर्ण याद आते हैं, लेकिन नीति बनाते वक्त वही समाज सबसे पहले कुर्बान कर दिया जाता है।

आपकी क्या राय है कमेंट में जरूर बताए।

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UGC के काले कानून को सवर्ण समाज कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। हम सब एक साथ मिलकर इसका कड़ा विरोध करते हैं।
यह हमारे अधिकारों पर हमला है और हम इसे सहेंगे नहीं।
महाआंदोलन की तैयारी शुरू हो चुकी है, सरकार को यह फैसला वापस लेना ही होगा।
सभी साथी एकजुट हो जाएं और अपनी आवाज बुलंद करें!
#ugc_rollback

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