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जय श्री राधेश्याम ❤️🙏

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वो सुरंग जो चारधाम यात्रा को सुरक्षित बना रही है

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हरियाणा के सिरसा ज़िले में एक साधारण ड्राइवर की ज़िंदगी एक झटके में बदल गई। पेशे से ड्राइवर पृथ्वी सिंह ने ₹500 के लॉटरी टिकट से ₹10 करोड़ की बड़ी रकम जीत ली। पृथ्वी सिंह ने बताया कि उन्होंने कुल तीन टिकट खरीदे थे, जिनमें ₹500, ₹200 और ₹100 के टिकट शामिल थे, और किस्मत ₹500 वाले टिकट पर मेहरबान हुई। उनकी पत्नी सुमन एक स्कूल में चपरासी के पद पर कार्यरत हैं। अचानक मिली इस बड़ी जीत के बाद परिवार में खुशी का माहौल है और इलाके में भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है।

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हर हर महादेव 🙏🔱
सुबह-सुबह कीजिए काशी विश्वनाथ जी के दर्शन,
भोलेनाथ की कृपा से कटें सारे कष्ट और बनें हर काम आसान।
जय श्री काशी विश्वनाथ 🚩🔱
हर हर महादेव 🙏

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Jai Shri Radhey hare Krishna

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प्रयागराज में चल रहे माघ मेला 2026 के अवसर पर 'मौनी अमावस्या' पर श्रद्धालुओं ने संगम में पवित्र स्नान किया. यह धार्मिक आयोजन वार्षिक परंपरा के अनुसार आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है.

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भारत की आत्मा उसकी संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों में बसती है। हाल ही में सामने आए एक सर्वे ने इस भावना को और मजबूत किया है—जिसके मुताबिक 90% हिंदू भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति की वापसी के पक्ष में हैं। यह सिर्फ एक शैक्षणिक बदलाव नहीं, बल्कि हमारी जड़ों से फिर से जुड़ने की एक ऐतिहासिक पहल मानी जा रही है।

गुरुकुल केवल पढ़ाई का स्थान नहीं होता था, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने का केंद्र होता था। यहाँ शिष्य को सिर्फ गणित, व्याकरण या शास्त्रों का ज्ञान नहीं मिलता था, बल्कि अनुशासन, सेवा, राष्ट्रप्रेम, करुणा और आत्मनिर्भरता जैसे मूल्यों का संस्कार भी मिलता था। गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं रहती थी—वह व्यवहार, आचरण और चरित्र निर्माण का माध्यम बनती थी।

आज के समय में जब शिक्षा अक्सर अंकों, प्रतिस्पर्धा और करियर तक सिमट गई है, तब गुरुकुल की अवधारणा एक संतुलन पेश करती है—जहाँ आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ वैदिक ज्ञान, योग, ध्यान और नैतिक शिक्षा भी साथ चलती है। समर्थकों का मानना है कि इस समन्वय से एक ऐसा युवा वर्ग तैयार होगा, जो न केवल कुशल होगा, बल्कि संवेदनशील, जिम्मेदार और देशभक्त भी होगा।

गुरुकुल प्रणाली की वापसी का विचार यह भी संकेत देता है कि भारत अपनी पहचान को लेकर जागरूक हो रहा है। यह बदलाव सिर्फ अतीत की ओर लौटना नहीं, बल्कि भविष्य को मजबूत नींव पर खड़ा करने का प्रयास है—जहाँ परंपरा और प्रगति हाथ में हाथ डालकर चलें।

क्या हम इस बदलाव के लिए तैयार हैं? अगर शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि जीवन निर्माण हो—तो गुरुकुल की भावना हमें उस दिशा में ले जा सकती है।

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ट्रोलिंग का शिकार हुईं हेमा मालिनी: क्या चेहरे के हाव-भाव से तय होता है सम्मान?

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने हेमा मालिनी को अचानक आलोचनाओं के केंद्र में ला खड़ा किया है। इस वीडियो में वह खिलाड़ियों को मेडल देती नजर आ रही हैं, लेकिन उनके चेहरे पर न मुस्कान दिखती है और न ही कोई खास भाव।

यही बात कई यूजर्स को नागवार गुज़री। लोगों का कहना है कि जब कोई खिलाड़ी मंच पर सम्मान लेने आता है, तो वह सिर्फ मेडल नहीं, बल्कि प्रोत्साहन और सम्मान की भावना भी चाहता है। वीडियो में हेमा मालिनी का ठंडा रवैया कुछ लोगों को असहज लगा।

हालांकि, कुछ यूजर्स ने उनका बचाव भी किया है। उनका कहना है कि किसी की भावना या सम्मान का अंदाजा सिर्फ चेहरे के हाव-भाव से नहीं लगाया जा सकता। संभव है कि वह थकी हुई हों या किसी और कारण से असहज महसूस कर रही हों।

यह पूरा मामला यह दिखाता है कि आज के दौर में सार्वजनिक व्यक्तित्वों का हर पल कैमरे की नजर में होता है—और एक छोटा सा क्लिप भी बड़ी बहस का कारण बन सकता है।

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देवरिया में बुलडोज़र कार्रवाई: 50 साल पुरानी मजार ढहाई गई, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

उत्तर प्रदेश के देवरिया से सामने आई एक घटना ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया है। यहां एक करीब 50 साल पुरानी मजार को बुलडोज़र से ढहा दिया गया। नगर पालिका अधिकारियों का कहना है कि यह ढांचा सरकारी जमीन पर बना हुआ था, जो कृषि उपयोग के लिए निर्धारित थी। इसी आधार पर इसे अवैध अतिक्रमण मानते हुए हटाया गया।

इस कार्रवाई का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसके बाद लोगों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। कुछ लोग इसे कानून के तहत सही कदम बता रहे हैं, तो वहीं कई लोग इस कार्रवाई को लेकर सवाल उठा रहे हैं—क्या इसे और संवेदनशील तरीके से नहीं किया जा सकता था?

प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई किसी खास समुदाय या स्थल को निशाना बनाकर नहीं की गई, बल्कि सरकारी जमीन को मुक्त कराने की नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह की कार्रवाई पहले भी अन्य अवैध ढांचों पर की जा चुकी है।

हालांकि, धार्मिक स्थलों से जुड़ी भावनाएं बेहद गहरी होती हैं। ऐसे मामलों में सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय पहलू भी उतने ही अहम हो जाते हैं। यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संवाद और विश्वास का भी बन चुका है।

यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि प्रशासनिक फैसले जब जनभावनाओं से टकराते हैं, तो विवाद और बहस का जन्म लेना तय है। ऐसे में पारदर्शिता, संवाद और संतुलन ही सबसे बड़ा समाधान हो सकता है।

#deorianews #bulldozeraction #landdispute

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