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मध्य प्रदेश के हरदा जिले की एक किसान की बेटी, प्रियल यादव ने MPPSC 2021 परीक्षा में छठी रैंक हासिल कर डिप्टी कलेक्टर का पद प्राप्त किया है। वर्तमान में इंदौर में जिला पंजीयक के रूप में कार्यरत 27 वर्षीय प्रियल ने लगातार तीसरी बार राज्य सेवा परीक्षा पास की है।
प्रियल ने खुलासा किया कि रिश्तेदारों के दबाव में विज्ञान विषय लेने के कारण वह 11वीं कक्षा में फेल हो गई थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी मेहनत जारी रखी। इससे पहले वह 2019 और 2020 की परीक्षाओं में भी चयनित हो चुकी हैं। प्रियल का सपना अब नौकरी के साथ यूपीएससी (UPSC) की तैयारी कर आईएएस अधिकारी बनने का है।
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले की सिमरनजीत कौर ने राज्य न्यायिक सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर सिविल जज बनने का मुकाम हासिल किया है। एक साधारण ट्रक ड्राइवर की बेटी सिमरनजीत ने इस सफलता के लिए प्रतिदिन 15-18 घंटे तक कड़ी पढ़ाई की। सिमरनजीत ने अपनी कामयाबी का मुख्य श्रेय अपने ताया के बेटे इकबाल सिंह और अन्य परिजनों के सहयोग को दिया है।
उनके पिता अमरीक सिंह ने भावुक होकर कहा कि बेटी की सफलता ने उन्हें समाज में उस ऊंचे स्थान पर खड़ा कर दिया है जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सिमरनजीत ने पंजाब यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई पूरी की और चंडीगढ़ से कोचिंग ली थी।
बिहार के पटना की अभिलाषा अभिनव ने फुल-टाइम नौकरी और शादी के सामाजिक दबाव के बीच यूपीएससी (UPSC) 2017 में 18वीं रैंक हासिल कर आईएएस (IAS) बनने का सपना पूरा किया। उन्होंने अपने परिवार को मना लिया था कि वे सिविल सेवा परीक्षा पास करने के बाद ही शादी करेंगी।
इससे पहले 2016 में उन्हें 308वीं रैंक मिली थी और वे आईआरएस (IRS) बनी थीं, लेकिन वे इससे संतुष्ट नहीं थीं। अपने लक्ष्य को पाने के लिए उन्होंने ऑफिस आने-जाने के समय और वीकेंड का पूरा सदुपयोग पढ़ाई के लिए किया। बीटेक ग्रेजुएट और पूर्व सीबीएसई टॉपर अभिलाषा वर्तमान में तेलंगाना कैडर में तैनात हैं।
भारत की पहली महिला डॉक्टर, जिन्होंने रूढ़ियों की जंजीरें तोड़कर विदेश में मेडिसिन की पढ़ाई की। उनका संघर्ष हर भारतीय नारी के लिए प्रेरणा है।
19वीं सदी का वह दौर जब महिलाओं का घर से निकलना भी मुश्किल था, तब एक महिला ने 'सात समंदर पार' जाकर डॉक्टर बनने की ठानी। वह थीं—आनंदीबाई जोशी। मात्र 9 साल की उम्र में शादी और 14 साल की उम्र में अपने नवजात बच्चे को इलाज के अभाव में खो देने के दर्द ने उन्हें बदल दिया।
उन्होंने कसम खाई कि वे डॉक्टर बनेंगी ताकि किसी और माँ की गोद सूनी न हो। तमाम आलोचनाओं और खराब सेहत के बावजूद, उन्होंने 1886 में अमेरिका से MD की डिग्री हासिल की। आनंदीबाई जोशी सिर्फ एक डॉक्टर नहीं, बल्कि एक मिसाल हैं। नमन है उनके जज्बे को!
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